Section A – प्रारंभिक समाज (Early Societies)
(अध्याय 1: लेखन कला और शहरी जीवन)
इस खंड में मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास को विशेष रूप से मेसोपोटामिया सभ्यता के माध्यम से समझाया गया है। मेसोपोटामिया का अर्थ है “दो नदियों के बीच की भूमि” — दजला (टाइग्रिस) और फरात (युफ्रेट्स)। यही क्षेत्र विश्व की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक का केंद्र बना।
यहाँ कृषि की शुरुआत लगभग 7000–6000 ईसा पूर्व के बीच हुई। उपजाऊ मिट्टी और नदी जल ने कृषि को संभव बनाया, जिससे अधिशेष उत्पादन हुआ। इसी अधिशेष के कारण श्रम विभाजन विकसित हुआ — कुछ लोग किसान रहे, तो कुछ कारीगर, व्यापारी, पुजारी और शासक बने।
शहरी जीवन का विकास लेखन प्रणाली के विकास से जुड़ा हुआ था। 3200 ईसा पूर्व के आसपास क्यूनिफॉर्म लिपि का विकास हुआ। प्रारंभ में चित्रात्मक चिह्नों का प्रयोग किया गया, जो बाद में व्यवस्थित लिपि में परिवर्तित हुए। लेखन का उपयोग व्यापारिक लेन-देन का रिकॉर्ड रखने, प्रशासन चलाने और साहित्य सृजन के लिए किया गया।
मंदिर उस समय केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के भी केंद्र थे। मंदिरों में अनाज का भंडारण, वस्त्र निर्माण और व्यापारिक नियंत्रण किया जाता था।
इस प्रकार प्रारंभिक समाजों में नदी, कृषि, लेखन और शहरीकरण ने मिलकर सभ्यता की नींव रखी।
प्रश्न:
मेसोपोटामिया में लेखन के विकास के मुख्य कारण क्या थे?
प्रारंभिक समाजों में मंदिरों की आर्थिक भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Section B – साम्राज्य (Empires)
(अध्याय 2: तीन महाद्वीपों में फैला एक साम्राज्य, अध्याय 3: यायावर साम्राज्य)
इस खंड में रोमन साम्राज्य और यायावर साम्राज्यों का अध्ययन किया गया है। रोमन साम्राज्य यूरोप, एशिया और अफ्रीका के तीन महाद्वीपों तक फैला हुआ था। 27 ईसा पूर्व में ऑगस्टस द्वारा स्थापित ‘प्रिंसिपेट’ शासन प्रणाली ने रोमन साम्राज्य को संगठित किया।
रोमन साम्राज्य की प्रशासनिक प्रणाली मजबूत थी। सेना एक संगठित और वेतनभोगी संस्था थी, जो साम्राज्य की सुरक्षा का मुख्य आधार थी। रोमन अर्थव्यवस्था व्यापार, बंदरगाहों, खानों और कृषि पर आधारित थी। एम्फोरा नामक पात्रों में जैतून का तेल और शराब का व्यापार होता था।
तीसरी सदी में रोमन साम्राज्य को संकटों का सामना करना पड़ा। बाहरी आक्रमणों और आंतरिक संघर्षों ने उसकी स्थिरता को चुनौती दी। बाद में कॉन्स्टेंटाइन ने ईसाई धर्म को आधिकारिक मान्यता दी, जिससे सांस्कृतिक परिवर्तन हुए।
यायावर साम्राज्यों में मंगोलों और अन्य घुमंतू समूहों का अध्ययन शामिल है। ये लोग स्थायी कृषि पर निर्भर न होकर पशुपालन और युद्ध कौशल पर निर्भर थे। इनका प्रभाव एशिया और यूरोप दोनों पर पड़ा।
साम्राज्य केवल राजनीतिक शक्ति का प्रतीक नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यापार विस्तार और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम भी थे।
प्रश्न:
रोमन साम्राज्य की प्रशासनिक और आर्थिक विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
यायावर साम्राज्यों का स्थायी सभ्यताओं पर क्या प्रभाव पड़ा?
Section C – बदलती सांस्कृतिक परंपराएँ और आधुनिकीकरण (Changing Traditions & Towards Modernisation)
(अध्याय 4 से 7 तक)
इस खंड में मध्यकालीन यूरोप की सामाजिक संरचना, पुनर्जागरण, उपनिवेशवाद और आधुनिकता की प्रक्रिया का अध्ययन किया गया है।
‘तीन वर्ग’ (The Three Orders) की अवधारणा में समाज को तीन भागों में विभाजित किया गया — पादरी, कुलीन और किसान। यह सामंती व्यवस्था का आधार था।
पुनर्जागरण काल में मानववाद, कला और विज्ञान का विकास हुआ। यूरोप में नई खोजों और विचारों ने पारंपरिक सोच को चुनौती दी। छापाखाना और शिक्षा के प्रसार ने ज्ञान के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘मूल निवासियों का विस्थापन’ अध्याय में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों पर उपनिवेशवाद के प्रभाव का वर्णन है। यूरोपीय शक्तियों ने वहाँ की भूमि और संसाधनों पर कब्जा किया, जिससे मूल निवासियों को विस्थापन और सांस्कृतिक संकट का सामना करना पड़ा।
‘आधुनिकीकरण के रास्ते’ अध्याय में जापान और चीन के उदाहरण दिए गए हैं। जापान ने मेजी पुनर्स्थापन के माध्यम से आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र का रूप लिया, जबकि चीन को पश्चिमी शक्तियों के दबाव का सामना करना पड़ा।
यह खंड दर्शाता है कि सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परिवर्तन और औद्योगिक विकास ने आधुनिक विश्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रश्न:
पुनर्जागरण आंदोलन ने यूरोपीय समाज को किस प्रकार प्रभावित किया?
जापान के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चीन से किस प्रकार भिन्न थी?